Saturday, 5 July 2014

निरंतरता

ताप से झुलसे हम
 वर्षा बहार की आस में बैठे थे
 प्यासी - तड़पती नदियों को
 चाह थी जीवन की ।

 माँ धरा - फटी बिबाइयाँ
 पूरने कि ख़ातिर
 टकटकी लगाए
 निरभ्र आकाश में
 अपने श्याम-सलोने को ढूँढ रही थी ।

 पर यह कैसी विडम्बना थी,
 यह किसका भेजा पैग़ाम था !
 प्रकृति का या नियति का
 या-काल ने सुपारी दे रखी थी
 उस नदी  को ।

 ऊँचे पहाड़ों की गोद में
 मचलती नदी का बाँध
 अचानक  किसने आ खोला था
 हरहराती उतरी जो व्यास,
 कि - धाराएँ तक ना संभाल सकीं
 उसका क्रोध-तप्त प्रवाह ।

 बेदर्द, निडर, उन्मादनी
 लूट ले गयी-
 अनेक घरों की अपार ख़ुशियाँ ।

 सिसक उठा मनाली का कण-कण
 बढ़ गयीं  धड़्कने जन जन की,
 हवाएँ उछलते जल कणों के बीच
 स्तब्ध रह गयीं,
 शीत बर्फ़ बन गयी,
 रक्षा हेतु बढे हाथ
 असहाय हो गये
 पकड़ न सके अकेले अनेक को ।

 थम गये पल
 घेरा उदासी का मज़बूत हुआ
 आँखें पथरा गयीं।

 चेतन- मन की
 आंनदित लहरों में बहते
 समय की भयावहता से अनजानों को
 एक बँधन-मुक्त नदी बहा ले गयी ।

 चेतना छीनी तो छीनी
 साथ ही उनका स्थूल भी
 पूरा का पूरा उसने
 स्वयं ही विसर्जित करने की ठान ली ।

 परिवार-जन हाथ मलते रहे.
 आँसुओं की धाराएँ
 नदी के वेग से मिलने को
 आतुर हो गयीं ।

 शायद वाष्पीकृत हो
 वे बादल बन ढूँढने
 उतर पड़ें
 अपने हृदय के टुकड़ों को ।

 काश!  ऐसा संभव होता ।

 दूर बहती व्यास
 धीरे-धीरे अब शांत  होती जा रही है
 पर रुकना  उसे नहीं आता,
 अपनी निरंतरता लिये
 वह बढ़ी जा रही है ।

 निरंतरता मृत्यु की या जीवन की
 या दोनो की
 शायद वह इस गुत्थी को सुलझाने
 आगे बढ़ी जा रही है ।

 जो भी हो -
 मैं इतना ही समझती हूँ
 नदी गति जानती है,
 लक्ष्य जानती है,
 घटनाएँ कैसी भी हों
 इतिहास दोहराती हैं ।


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