ताप से झुलसे हम
वर्षा बहार की आस में बैठे थे
प्यासी - तड़पती नदियों को
चाह थी जीवन की ।
माँ धरा - फटी बिबाइयाँ
पूरने कि ख़ातिर
टकटकी लगाए
निरभ्र आकाश में
अपने श्याम-सलोने को ढूँढ रही थी ।
पर यह कैसी विडम्बना थी,
यह किसका भेजा पैग़ाम था !
प्रकृति का या नियति का
या-काल ने सुपारी दे रखी थी
उस नदी को ।
ऊँचे पहाड़ों की गोद में
मचलती नदी का बाँध
अचानक किसने आ खोला था
हरहराती उतरी जो व्यास,
कि - धाराएँ तक ना संभाल सकीं
उसका क्रोध-तप्त प्रवाह ।
बेदर्द, निडर, उन्मादनी
लूट ले गयी-
अनेक घरों की अपार ख़ुशियाँ ।
सिसक उठा मनाली का कण-कण
बढ़ गयीं धड़्कने जन जन की,
हवाएँ उछलते जल कणों के बीच
स्तब्ध रह गयीं,
शीत बर्फ़ बन गयी,
रक्षा हेतु बढे हाथ
असहाय हो गये
पकड़ न सके अकेले अनेक को ।
थम गये पल
घेरा उदासी का मज़बूत हुआ
आँखें पथरा गयीं।
चेतन- मन की
आंनदित लहरों में बहते
समय की भयावहता से अनजानों को
एक बँधन-मुक्त नदी बहा ले गयी ।
चेतना छीनी तो छीनी
साथ ही उनका स्थूल भी
पूरा का पूरा उसने
स्वयं ही विसर्जित करने की ठान ली ।
परिवार-जन हाथ मलते रहे.
आँसुओं की धाराएँ
नदी के वेग से मिलने को
आतुर हो गयीं ।
शायद वाष्पीकृत हो
वे बादल बन ढूँढने
उतर पड़ें
अपने हृदय के टुकड़ों को ।
काश! ऐसा संभव होता ।
दूर बहती व्यास
धीरे-धीरे अब शांत होती जा रही है
पर रुकना उसे नहीं आता,
अपनी निरंतरता लिये
वह बढ़ी जा रही है ।
निरंतरता मृत्यु की या जीवन की
या दोनो की
शायद वह इस गुत्थी को सुलझाने
आगे बढ़ी जा रही है ।
जो भी हो -
मैं इतना ही समझती हूँ
नदी गति जानती है,
लक्ष्य जानती है,
घटनाएँ कैसी भी हों
इतिहास दोहराती हैं ।
वर्षा बहार की आस में बैठे थे
प्यासी - तड़पती नदियों को
चाह थी जीवन की ।
माँ धरा - फटी बिबाइयाँ
पूरने कि ख़ातिर
टकटकी लगाए
निरभ्र आकाश में
अपने श्याम-सलोने को ढूँढ रही थी ।
पर यह कैसी विडम्बना थी,
यह किसका भेजा पैग़ाम था !
प्रकृति का या नियति का
या-काल ने सुपारी दे रखी थी
उस नदी को ।
ऊँचे पहाड़ों की गोद में
मचलती नदी का बाँध
अचानक किसने आ खोला था
हरहराती उतरी जो व्यास,
कि - धाराएँ तक ना संभाल सकीं
उसका क्रोध-तप्त प्रवाह ।
बेदर्द, निडर, उन्मादनी
लूट ले गयी-
अनेक घरों की अपार ख़ुशियाँ ।
सिसक उठा मनाली का कण-कण
बढ़ गयीं धड़्कने जन जन की,
हवाएँ उछलते जल कणों के बीच
स्तब्ध रह गयीं,
शीत बर्फ़ बन गयी,
रक्षा हेतु बढे हाथ
असहाय हो गये
पकड़ न सके अकेले अनेक को ।
थम गये पल
घेरा उदासी का मज़बूत हुआ
आँखें पथरा गयीं।
चेतन- मन की
आंनदित लहरों में बहते
समय की भयावहता से अनजानों को
एक बँधन-मुक्त नदी बहा ले गयी ।
चेतना छीनी तो छीनी
साथ ही उनका स्थूल भी
पूरा का पूरा उसने
स्वयं ही विसर्जित करने की ठान ली ।
परिवार-जन हाथ मलते रहे.
आँसुओं की धाराएँ
नदी के वेग से मिलने को
आतुर हो गयीं ।
शायद वाष्पीकृत हो
वे बादल बन ढूँढने
उतर पड़ें
अपने हृदय के टुकड़ों को ।
काश! ऐसा संभव होता ।
दूर बहती व्यास
धीरे-धीरे अब शांत होती जा रही है
पर रुकना उसे नहीं आता,
अपनी निरंतरता लिये
वह बढ़ी जा रही है ।
निरंतरता मृत्यु की या जीवन की
या दोनो की
शायद वह इस गुत्थी को सुलझाने
आगे बढ़ी जा रही है ।
जो भी हो -
मैं इतना ही समझती हूँ
नदी गति जानती है,
लक्ष्य जानती है,
घटनाएँ कैसी भी हों
इतिहास दोहराती हैं ।
बेहद भावपूर्ण रचना.
ReplyDelete