अबला
नारी! तुम उपेक्षिता रहीं
अनुगामिनी बनी पुरुषों के आदर्शों की,
निज-भावाव्यक्ति-वंचिता थी तुम।
गौतम ऋषि की पत्नी
अहिल्या ही तो थीं तुम
इन्द्र की वासना का
छल से शिकार बनीं
आत्म-बोध भूल
पत्थर बन पड़ी रहीं
अबला तो थीं ही, जड़ भी हो गयीं।
सीता बन पति के साथ
वनगामिनी बनीं,वल्कल वस्त्रों,
पत्रों के बिछावन में सुख
देखती रहीं।
उर्मिला घुट-घुट अपनी
व्यथा-कथा-
अश्रु-नीर को सुनाती रही,
ईर्ष्या-भाव भी न जागा था
उसके मन में
आदर्शों की परिणति
बन दबी रहीं।
बालि की पत्नी तारा बन
विश्वासघात सहती रहीं।
प्रेम-पगी राधा बन
विरहाग्नि में तुम्ही तो जलीं।
कुन्ती बन जीवन भर
अपराध-बोध जीती रहीं।
चौपड़ की बाज़ी बनी
द्रौपदी अपने संरक्षकों के
हाथों बिकी, पुरुषों का
घिनौना आचरण सहने को
विवश हुईं।
आत्म-निर्वाण की चाहत में
यशोधरा को एकाकी छोड़
रात्रि के सन्नाटे में सिद्धार्थ
चुप-चाप घर से निकल गये
पुत्र-मोह भी न व्यापा था उन्हें!
अर्धांगनी - तुम तो
उपेक्षिता भी हो गयीं।
युगों से तुम आँखों में पानी
और वात्सल्य क कटोरा लिये
गृह-लक्ष्मी के
लाख-टके टँकी रहीं
पुरुषों के पुरुषत्व की बलि चढ़ीं
आत्म-विश्वास भी तो तुम खो बैठीं।
गुहार सुन युग- चेतना की
समय की पसलियाँ चरमरा उठीं
शांत सागर में ज्वार उठने लगा
भूधर भी काँप उठे।
एक दिन तुम वीरांगना हाड़ा,
रानी लक्ष्मीबाई,एनीबेसन्ट,
मदर टेरेसा, बछेन्द्रीपाल,
कल्पना चावला,आकाशपरी सुनीता बन
नया इतिहास रचने लगीं।
संसद में भी आज
ज़ोर-शोर से छा रही हो।
पर तुम्हारी सारी चैतन्यता
अभी तक अधूरी ही लगती है।
आगे तो बढ़्ती हो, पर
जगा नहीं पातीं अलख
नग्नता का मुलम्मा चढ़ा कर ही
तुम्हें सदा पेश किया जाता है।
कुवासनाओं के जंगल में
हब्शी दरिंदों से
बचती बचाती भी
तुम उन्हीं के चंगुल में
फंस जाती हो
अपने ही हाथों अपना (कन्या भ्रूण)
बलिदान कर रही हो।
जागो! युवतियों
तुम आत्मरक्षा का गुर सीख लो
क्योंकि हवाओं का रूख
बार-बार दुहरा रहा है-
नारी तुम बला नहीं अबल भी नहीं हो
सबला तुम, हिम्मत से काम लो।
समय की करवट बदलो,
छली दुर्योधन को ललकारो!
अज्ञान तिमिर में
सुर्य बन चमको
अंध कूप से उबरो और
औरों को भी उबारो
अपनी पौध को पनपने दो।
तुम वंदनीय पूजनीय हो
तुम्हें शक्ति बन कर
सारे विश्व में
छा जाना है।