Saturday, 5 July 2014

दर्द एक अभिव्यक्ति     

 कल एक कौआ उड़
 आ बैठा मुँडेर पर-
 ताज़गी थी काँव-काँव में
 खुशी का बोध था ।

 आया था आज भी
 न कोई हलचल
 न कोई शोर
 नुचे-खुचे पंख लटके
 जता रहे थे-
 बीते कल और आज का अन्तर
 अभिव्यक्त था उदासी में
 उसका असहायपन ।

 कहीं न कहीं हम
 नुचे-खुचे काग सम
 हारे ढो रहे जीवन-पंख
 शब्द-हीन रचते
 ढोंग जीवन्त रहने का ।
 

No comments:

Post a Comment