दर्द एक अभिव्यक्ति
कल एक कौआ उड़
आ बैठा मुँडेर पर-
ताज़गी थी काँव-काँव में
खुशी का बोध था ।
आया था आज भी
न कोई हलचल
न कोई शोर
नुचे-खुचे पंख लटके
जता रहे थे-
बीते कल और आज का अन्तर
अभिव्यक्त था उदासी में
उसका असहायपन ।
कहीं न कहीं हम
नुचे-खुचे काग सम
हारे ढो रहे जीवन-पंख
शब्द-हीन रचते
ढोंग जीवन्त रहने का ।
कल एक कौआ उड़
आ बैठा मुँडेर पर-
ताज़गी थी काँव-काँव में
खुशी का बोध था ।
आया था आज भी
न कोई हलचल
न कोई शोर
नुचे-खुचे पंख लटके
जता रहे थे-
बीते कल और आज का अन्तर
अभिव्यक्त था उदासी में
उसका असहायपन ।
कहीं न कहीं हम
नुचे-खुचे काग सम
हारे ढो रहे जीवन-पंख
शब्द-हीन रचते
ढोंग जीवन्त रहने का ।
No comments:
Post a Comment