kavita vidha: निरंतरता: ताप से झुलसे हम वर्षा बहार की आस में बैठे थे प्यासी - तड़पती नदियों को चाह थी जीवन की । माँ धरा - फटी बिबाइयाँ पूरने कि ख़ातिर टकटकी लग...
नारी मैं – न कहो मुझसे ना, री ! उतरी हूँ सागर में तो पैठूँगी तलहटी में खोजूँगी मुक्ता – प्रवाल खंगालूँगी सारा सागर डूबूँगी नहीं पर्वत बन निकलूँगी अंधकार की कारा तोड़ किरण रथ चढूँगी जड़ता ,अवरुद्धता कट्टरता- धर्मान्धता की नींवें हिला बिगुल स्वाधिकार का मैं स्वयं ही बजाऊँगी सुरक्षा कवच आत्मरक्षा का दान नहीं माँगूँगी, मैं स्वयं बन जाऊँगी दीवार आत्मबल की सुदृढ़ बनाऊँगी नीलाम्बर में छाऊँगी पंछी बन उडूँगी सूर्यप्रकाश सा फैलूँगी अबला नहीं थी कभी सबला थी राख़ में दबी चिंगारी थी पर अब मैं मशाल हूँ राह बन बढूँगी कोनों कोनों को छुऊँगी सभी को राह दिखाऊँगी |
निश्चय- कविता पुष्पा मेहरा दि.८.३. १६
ReplyDeleteनारी मैं – न कहो मुझसे ना, री !
उतरी हूँ सागर में तो
पैठूँगी तलहटी में
खोजूँगी मुक्ता – प्रवाल
खंगालूँगी सारा सागर
डूबूँगी नहीं
पर्वत बन निकलूँगी
अंधकार की कारा तोड़
किरण रथ चढूँगी
जड़ता ,अवरुद्धता
कट्टरता- धर्मान्धता की
नींवें हिला
बिगुल स्वाधिकार का
मैं स्वयं ही बजाऊँगी
सुरक्षा कवच आत्मरक्षा का
दान नहीं माँगूँगी,
मैं स्वयं बन जाऊँगी
दीवार आत्मबल की
सुदृढ़ बनाऊँगी
नीलाम्बर में छाऊँगी
पंछी बन उडूँगी
सूर्यप्रकाश सा फैलूँगी
अबला नहीं थी कभी
सबला थी
राख़ में दबी चिंगारी थी
पर अब मैं मशाल हूँ
राह बन बढूँगी
कोनों कोनों को छुऊँगी
सभी को राह दिखाऊँगी |