Saturday, 12 March 2016



Elusive



In   the long    journey of life
Shadows   of   desires
Always bewitch   me 
But pebbles of sorrow  
 Shatter my    innocent    desires
Like the image in a broken mirror   .

Wandering   lonely   in   the mountains
With   jumbled   up   thoughts
Looking down upon the dancing waves
Of   the   blue sea
The   sky, peeping from its bottom
Ebb   and tides distract my attention
Like   my  unfulfilled   desires.

I   want to bathe in the fountain of light
To   hold on to its magnificent charm   ,
But the fountain of light, I know, 
 Is an illusion,   like the   eternal joy ?



The   sunrays   passing through want to cover
All the dispersed leaves and branches of a tree                
I, in search of unheralded path of happy valley, 
Gathering all   the thoughts   together
Look for the   eternal peace,
My   consciousness   wavers   
And I only behold the shoreless glittering sky                 
                                                                               
Alas, all is elusive.                                                                

Pushpa  Mehra
Pushpa.mehra@gmail.com


Tuesday, 24 February 2015

kavita vidha: निरंतरता

kavita vidha: निरंतरता: ताप से झुलसे हम  वर्षा बहार की आस में बैठे थे  प्यासी - तड़पती नदियों को  चाह थी जीवन की ।  माँ धरा - फटी बिबाइयाँ  पूरने कि ख़ातिर  टकटकी लग...

Saturday, 5 July 2014

दर्द एक अभिव्यक्ति     

 कल एक कौआ उड़
 आ बैठा मुँडेर पर-
 ताज़गी थी काँव-काँव में
 खुशी का बोध था ।

 आया था आज भी
 न कोई हलचल
 न कोई शोर
 नुचे-खुचे पंख लटके
 जता रहे थे-
 बीते कल और आज का अन्तर
 अभिव्यक्त था उदासी में
 उसका असहायपन ।

 कहीं न कहीं हम
 नुचे-खुचे काग सम
 हारे ढो रहे जीवन-पंख
 शब्द-हीन रचते
 ढोंग जीवन्त रहने का ।
 
       अबला               

नारी! तुम उपेक्षिता रहीं
अनुगामिनी बनी पुरुषों के आदर्शों की,
निज-भावाव्यक्ति-वंचिता थी तुम।

गौतम ऋषि  की पत्नी
अहिल्या ही तो थीं तुम
इन्द्र की वासना का
छल से शिकार बनीं
आत्म-बोध भूल
पत्थर बन पड़ी रहीं
अबला तो थीं ही, जड़ भी हो गयीं।


सीता बन पति के साथ
वनगामिनी बनीं,वल्कल वस्त्रों,
पत्रों के बिछावन में सुख
देखती रहीं।

उर्मिला घुट-घुट अपनी
व्यथा-कथा-
अश्रु-नीर को सुनाती रही,
ईर्ष्या-भाव भी न जागा था
उसके मन में
आदर्शों की परिणति
बन दबी रहीं।

बालि की पत्नी तारा बन
विश्वासघात सहती रहीं।

प्रेम-पगी राधा बन
विरहाग्नि में तुम्ही तो जलीं।

कुन्ती बन जीवन भर
अपराध-बोध जीती रहीं।

चौपड़ की बाज़ी बनी
द्रौपदी अपने संरक्षकों के
हाथों बिकी, पुरुषों का
घिनौना आचरण सहने को
विवश हुईं।

आत्म-निर्वाण की चाहत में
यशोधरा को एकाकी छोड़ 
रात्रि के सन्नाटे में सिद्धार्थ
चुप-चाप घर से निकल गये
पुत्र-मोह भी न व्यापा था उन्हें!
अर्धांगनी - तुम तो
उपेक्षिता भी हो गयीं।

युगों से तुम आँखों में पानी
और वात्सल्य क कटोरा लिये
गृह-लक्ष्मी के
लाख-टके टँकी रहीं

पुरुषों के पुरुषत्व की बलि चढ़ीं
आत्म-विश्वास भी तो तुम खो बैठीं।

गुहार सुन युग- चेतना की
समय की पसलियाँ चरमरा उठीं
शांत सागर में ज्वार उठने लगा
भूधर भी काँप उठे।

एक दिन तुम  वीरांगना हाड़ा,
रानी लक्ष्मीबाई,एनीबेसन्ट,
मदर टेरेसा, बछेन्द्रीपाल,
कल्पना चावला,आकाशपरी सुनीता बन
नया इतिहास रचने लगीं।

संसद में भी आज
ज़ोर-शोर से छा रही हो।
पर तुम्हारी सारी चैतन्यता
अभी तक अधूरी ही लगती है।

आगे तो बढ़्ती हो, पर
जगा नहीं पातीं अलख
नग्नता का मुलम्मा चढ़ा कर ही
तुम्हें सदा पेश किया जाता है।

कुवासनाओं के जंगल में
हब्शी दरिंदों से
बचती बचाती भी
तुम उन्हीं के चंगुल में
फंस जाती हो
अपने ही हाथों अपना (कन्या भ्रूण)
बलिदान कर रही हो।

जागो! युवतियों
तुम आत्मरक्षा का गुर सीख लो
क्योंकि हवाओं का रूख
बार-बार दुहरा रहा है-
नारी तुम बला नहीं अबल भी नहीं हो
सबला तुम, हिम्मत से काम लो।

समय की करवट बदलो,
छली दुर्योधन को ललकारो!
अज्ञान तिमिर में
सुर्य बन चमको
अंध कूप से उबरो और
औरों को भी उबारो
अपनी पौध को पनपने दो।

तुम वंदनीय पूजनीय हो
तुम्हें  शक्ति बन कर
सारे  विश्व में
छा जाना है।

निरंतरता

ताप से झुलसे हम
 वर्षा बहार की आस में बैठे थे
 प्यासी - तड़पती नदियों को
 चाह थी जीवन की ।

 माँ धरा - फटी बिबाइयाँ
 पूरने कि ख़ातिर
 टकटकी लगाए
 निरभ्र आकाश में
 अपने श्याम-सलोने को ढूँढ रही थी ।

 पर यह कैसी विडम्बना थी,
 यह किसका भेजा पैग़ाम था !
 प्रकृति का या नियति का
 या-काल ने सुपारी दे रखी थी
 उस नदी  को ।

 ऊँचे पहाड़ों की गोद में
 मचलती नदी का बाँध
 अचानक  किसने आ खोला था
 हरहराती उतरी जो व्यास,
 कि - धाराएँ तक ना संभाल सकीं
 उसका क्रोध-तप्त प्रवाह ।

 बेदर्द, निडर, उन्मादनी
 लूट ले गयी-
 अनेक घरों की अपार ख़ुशियाँ ।

 सिसक उठा मनाली का कण-कण
 बढ़ गयीं  धड़्कने जन जन की,
 हवाएँ उछलते जल कणों के बीच
 स्तब्ध रह गयीं,
 शीत बर्फ़ बन गयी,
 रक्षा हेतु बढे हाथ
 असहाय हो गये
 पकड़ न सके अकेले अनेक को ।

 थम गये पल
 घेरा उदासी का मज़बूत हुआ
 आँखें पथरा गयीं।

 चेतन- मन की
 आंनदित लहरों में बहते
 समय की भयावहता से अनजानों को
 एक बँधन-मुक्त नदी बहा ले गयी ।

 चेतना छीनी तो छीनी
 साथ ही उनका स्थूल भी
 पूरा का पूरा उसने
 स्वयं ही विसर्जित करने की ठान ली ।

 परिवार-जन हाथ मलते रहे.
 आँसुओं की धाराएँ
 नदी के वेग से मिलने को
 आतुर हो गयीं ।

 शायद वाष्पीकृत हो
 वे बादल बन ढूँढने
 उतर पड़ें
 अपने हृदय के टुकड़ों को ।

 काश!  ऐसा संभव होता ।

 दूर बहती व्यास
 धीरे-धीरे अब शांत  होती जा रही है
 पर रुकना  उसे नहीं आता,
 अपनी निरंतरता लिये
 वह बढ़ी जा रही है ।

 निरंतरता मृत्यु की या जीवन की
 या दोनो की
 शायद वह इस गुत्थी को सुलझाने
 आगे बढ़ी जा रही है ।

 जो भी हो -
 मैं इतना ही समझती हूँ
 नदी गति जानती है,
 लक्ष्य जानती है,
 घटनाएँ कैसी भी हों
 इतिहास दोहराती हैं ।